क्या कभी किसी ने कहा है
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
उन आँखों के लिए
जिनके समंदर सूख गए हों
और जिनमे मोतिआबिन्द हो।
क्या सदियों चली साँसों की गर्मी से सूखे, बिखरे
होठों को चूमने का साहस किसी ने किया है ?
शीशे जैसे अंग जब पिघल कर मोम से फ़ैल गए हों
और चांदी जैसे रंग बुझी आग की राख हो गए हों
क्या किसी ने आलिंगन बद्ध हो
साथ जीने मरने की कसमे खायीं हैं ?
या साथ साथ चलना , पर अलग अलग जाना भी प्यार है ?
मुरझाये वक्ष पर झुरियाये हाथ
क्या एक भद्दा मजाक है ?
या यह भी उसी अनंत प्यार का अहसास है ?
प्यार के दिन बस दो क्यों हो
प्यार जीवन में बस एक क्यों हो
प्यार की बस्ती इतनी तंग क्यों हो ?
सीमाएं नहीं जब वक्त की, सपनों की
प्यार की सीमाएं तय क्यों हो ?


