तुम्हे देखकर
एक इमारत याद आती है.
ताजमहल जो
जमी फाड़कर उछला फव्वारा है
या रति के हाथ से फिसलता झरना.
जिसका पानी यमुना में जा मिलता है.
तुम्हे देखकर यमुना की याद आती है
जो बह रही चुपचाप
राजा रानी की प्रणय साँसे सुनती हुई
जिनका भेद वो कभी न खोलेगी .
यमुना जो वैसी रही होगी कभी
जिसमे तुम्हारी परछाई दिखती होगी.


