Sunday, December 21, 2025

गुज़र गए

 तेरे सितम, अब हद से गुज़र गए

तू गुज़र न गुज़र, हम तो गुज़र गए.

क्या करें शिकवा तेरी बेरुखी का,

सितमगार तो गुज़रे, आशना - ए - दिल 

भी गुज़र गए.

जो बेहासिल थे, वो हुए फ़ना जीते जी,

जिन्हे हासिल था जहाँ, वो भी गुज़र गए.

क्या इल्म - ए - आदम, क्या खुदा की कुरान, 

वक़्त बदला, तो मानी बदल गए.


Sunday, August 12, 2012

मैं जो तुमसे कहना चाहता हूँ

तुम्हे खेलना है, खेलो .
छुपना है,  छुपो .
छुपो खेलो, खेलो छुपो।

तुम कबीर के दोहों में छुपकर रहना
तुम कुमार की आवाज़ में खो कर रहना
बुलंद इमारत के रास्ते, बरगद के पीछे रहना
मेरी कविता की तुम उपज हो
इन में तुम बसकर रहना .

मैं तुम्हे ढून्ढ लूँगा हरकभी
इन जगहों पर
मेरा आना जाना बना रहता है .

Tuesday, July 26, 2011

तुम्हे देखकर

तुम्हे देखकर
एक इमारत  याद आती है.
ताजमहल जो
जमी फाड़कर उछला फव्वारा है
या रति के हाथ से फिसलता झरना.
जिसका पानी यमुना में जा मिलता है.

तुम्हे देखकर यमुना की याद आती है
जो बह रही चुपचाप
राजा रानी की प्रणय साँसे सुनती हुई
जिनका भेद वो कभी न खोलेगी .

यमुना जो वैसी रही होगी कभी
जिसमे तुम्हारी  परछाई दिखती होगी.

Sunday, July 24, 2011

फिर से माधुरी

मुझे याद है माधुरी
जेल के बाहर खड़ी हुई
छरहरी लड़की
चेहरे पर जिद के निसान थे
मुझे याद है माधुरी
तहसील के दफ्तर में
बोलती हुंकारती लडती
साथिओ के हक़ दाव पर थे
मुझे याद है माधुरी
थकी, पसीने से लथपथ
जमीन पर पसरी
आँखों में अब भी
असंभव से ख्वाब थे
माधुरी अब कहती हो
तुम बूढा रही हो
कैसे माधुरी, कहाँ माधुरी 
देखो जहां जहाँ
तुम्हारा पसीना गिरा था
वहां वहां नयी कोपले फट रही हैं
मै यह भी याद रखूँगा माधुरी

Sunday, May 15, 2011

मोतिआबिन्द

क्या कभी किसी ने कहा है
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
उन आँखों के लिए
जिनके समंदर सूख गए हों
और जिनमे मोतिआबिन्द हो
क्या सदियों चली साँसों की गर्मी से सूखे, बिखरे
होठों को चूमने का साहस किसी ने किया है ?
शीशे जैसे अंग जब पिघल कर मोम से फ़ैल गए हों
और चांदी जैसे रंग बुझी आग की राख हो गए हों
क्या किसी ने आलिंगन बद्ध हो
साथ जीने मरने की कसमे खायीं हैं ?
या साथ साथ चलना , पर अलग अलग जाना भी प्यार है ?
मुरझाये वक्ष पर झुरियाये हाथ
क्या एक भद्दा मजाक है ?
या यह भी उसी अनंत प्यार का अहसास है ?
प्यार के दिन बस दो क्यों हो
प्यार जीवन में बस एक क्यों हो
प्यार की बस्ती इतनी तंग क्यों हो ?
सीमाएं नहीं जब वक्त की, सपनों की
प्यार की सीमाएं तय क्यों हो ?

Sunday, November 21, 2010

पश्चिम की तेज हवाएं , pashcim ki tej hawaaen

पश्चिम से आई तेज हवाओं ने
मछुआरों की नावे पलट दी,
और उलट दिए बुनकरों के टापरे ।
नहीं सह सकते ये अब
पूर्वी के भी धीमे थपेड़े ।
देदो देदो इन्हें, कम से कम
तिनकों के सहारे , वर्ना
महलों के ख्वाब अधूरे रह जायेंगे ।
तेज हवाओं से आग भी फैलती है
उसे फर्क नहीं मालूम
महलो और टापरों का।

Sunday, October 10, 2010

युद्ध, yuddha, War

अब फिर युद्ध,
अब फिर जागेगा जज्बा देश भक्ति का
अब फिर कफ़न ख़रीदे जायेंगे।
काफिलों की आरती होगी, पर धुंए का साया होगा,
कुमकुम के टीके होंगे, खून पर जाया होगा।
फिल्मो में सैनिक गीत गायेंगे,
मैदानों में गिद्ध जश्न मनाएंगे।
लता का गाना हर बैठक बजेगा,
मेडल से आँचल, फूलों से इंडिया गेट सजेगा।
माँ को होगा इन्तजार पदचापों का, बेटा तिरंगे में लेटा होगा,
गली गली अब चंदा होगा, उसमे भी गौरख धंदा होगा।
लहरों और हवाओं पे लाली होगी,
चेहरे पे सफेदी, आँखों में पानी होगा।
बन्दूक से निकली हर गोली गरीब की रोटी होगी,
रानी बिटिया भूखी सोती होगी।
सुन मेरे दोस्त, सुन मेरे भाई,
सरहद के उस पार, उसका भी कोई रोता होगा।