माधुरी
क्या तुम्हे पता है
तुम जब लड़कर थककर,
देर रात घर लौट ती हो
तुम्हारे पसीने से मिटटी की सौंध आती है ।
तुम चटाई पर पसरी
एक टक पंखा क्यों देखती हो
सोचती हो, यह ताडी बार बार
वापस वहीँ क्यों लौट जाती है ।
चालीस वाट का लट्टू भी तुम्हारी आँखों में चुभता है
क्या यह तुम्हे दिन के अंधेरो की याद दिलाता है .
तुम क्या स्वप्न देखती हो माधुरी
यही ना, की तुम
बिना कैनवास की फ्रेम पर चित्र बना सकती हो
तार टूटी वीणा पर दरबारी बजा सकती हो .
तुमने स्वप्न लोक को इह लोक में लाने की ठानी है
इसलिए
आज का रंगहीन सूरज जब कल उगेगा
तुम्हारे रक्त की लालिमा से लाल होगा
तुम भी खिड़की से जरूर देखना
माधुरी .
क्या तुम्हे पता है
तुम जब लड़कर थककर,
देर रात घर लौट ती हो
तुम्हारे पसीने से मिटटी की सौंध आती है ।
तुम चटाई पर पसरी
एक टक पंखा क्यों देखती हो
सोचती हो, यह ताडी बार बार
वापस वहीँ क्यों लौट जाती है ।
चालीस वाट का लट्टू भी तुम्हारी आँखों में चुभता है
क्या यह तुम्हे दिन के अंधेरो की याद दिलाता है .
तुम क्या स्वप्न देखती हो माधुरी
यही ना, की तुम
बिना कैनवास की फ्रेम पर चित्र बना सकती हो
तार टूटी वीणा पर दरबारी बजा सकती हो .
तुमने स्वप्न लोक को इह लोक में लाने की ठानी है
इसलिए
आज का रंगहीन सूरज जब कल उगेगा
तुम्हारे रक्त की लालिमा से लाल होगा
तुम भी खिड़की से जरूर देखना
माधुरी .



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