समझ कर चले थे
सिर्फ़ रास्ते हैं मंजिल नहीं
दुश्वार रास्तों पर साथ चलना
कुछ कम तो नहीं।
वो देखो दूर बालू पर
हमारे कदमों के निशां हैं
जरा बताओ तो
कौनसे मेरे हैं , कौनसे तुम्हारे
वक्त की बयार
इन निसानों को भी मिटा देगी
रह जायेंगे
पगथलिओं पर रेत के कण
जो कभी फटी बेवाई सा दर्द देंगे
और कभी , स्याह रातों में
माणिकों से चमक उठेंगे ।
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